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Yajurveda Adhyay 30 / Mantra 17

22 Mantra
30/17
Devata- राजेश्वरौ देवते Rishi- नारायण ऋषिः Chhand- विराट् धृतिः Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
बी॒भ॒त्सायै॑ पौल्क॒सं वर्णा॑य हिरण्यकारं तु॒लायै॑ वाणि॒जं प॑श्चादो॒षाय॑ ग्ला॒विनं॒ विश्वे॑भ्यो भू॒तेभ्यः॑ सिध्म॒लं भूत्यै॑ जागर॒णमभू॑त्यै स्वप॒नमार्त्यै॑ जनवा॒दिनं॒ व्यृद्ध्याऽअपग॒ल्भꣳ सꣳश॒राय॑ प्र॒च्छिद॑म्॥१७॥

बी॒भ॒त्सायै॑। पौ॒ल्क॒सम्। वर्णा॑य। हि॒र॒ण्य॒का॒रमिति॑ हिरण्यऽका॒रम्। तु॒लायै॑। वा॒णि॒जम्। प॒श्चा॒दो॒षायेति॑ पश्चाऽदो॒षाय॑। ग्ला॒विन॑म्। विश्वे॑भ्यः। भू॒तेभ्यः॑। सि॒ध्म॒लम्। भूत्यै॑। जा॒ग॒र॒णम्। अभू॑त्यै। स्व॒प॒नम्। आर्त्या॒ इत्याऽऋ॑त्यै। ज॒न॒वा॒दिन॒मिति॑ जनऽवा॒दिन॑म्। व्यृ᳖द्ध्या इति॒ विऽऋ॑ध्यै। अ॒प॒ग॒ल्भमित्य॑पऽग॒ल्भम्। स॒ꣳश॒रायेति॑ सम्ऽश॒राय॑। प्र॒च्छिद॒मिति॑ प्र॒ऽच्छिद॑म् ॥१७ ॥

Mantra without Swara
बीभत्सायै पौल्कसँवर्णाय हिरण्यकारन्तुलायै वाणिजम्पश्चादोषाय ग्लाविनँविश्वेभ्यो भूतेभ्यः सिध्मलम्भूत्यै जागरणमभूत्यै स्वपनमार्त्यै जनवादिनँव्यृद्धर्याऽअपगल्भँ सँशराय प्रच्छिदम् ॥

बीभत्सायै। पौल्कसम्। वर्णाय। हिरण्यकारमिति हिरण्यऽकारम्। तुलायै। वाणिजम्। पश्चादोषायेति पश्चाऽदोषाय। ग्लाविनम्। विश्वेभ्यः। भूतेभ्यः। सिध्मलम्। भूत्यै। जागरणम्। अभूत्यै। स्वपनम्। आर्त्या इत्याऽऋत्यै। जनवादिनमिति जनऽवादिनम्। व्यृद्ध्या इति विऽऋध्यै। अपगल्भमित्यपऽगल्भम्। सꣳशरायेति सम्ऽशराय। प्रच्छिदमिति प्रऽच्छिदम्॥१७॥

Meaning
हे जगदीश्वर वा राजन्! आप (बीभत्सायै) धमकाये के लिए प्रवृत्त हुए (पौल्कसम्) भंगी के पुत्र को (पश्चादोषाय) पीछे दोष को प्रवृत्त हुए (ग्लाविनम्) हर्ष को नष्ट करने वाले को (अभूत्यै) दरिद्रता के अर्थ समर्थ (स्वपनम्) सोने को (व्यृद्ध्यै) संपत् के बिगाड़ने के अर्थ प्रवृत्त हुए (अपगल्भम्) प्रगल्भतारहित पुरुष को तथा (संशराय) सम्यक् मारने के लिए प्रवृत्त हुए (प्रच्छिदम्) अधिक छेदन करनेवाले को पृथक् कीजिए और (वर्णाय) सुन्दर रूप बनाने के लिए (हिरण्यकारम्) सुनार वा सूर्य्य को (तुलायै) तोलने के अर्थ (वाणिजम्) बणिये के पुत्र को (विश्वेभ्यः) सब (भूतेभ्यः) प्राणियों के लिए (सिध्मलम्) सुख सिद्ध करने वाले जिस के सहायी हों, उस जन को (भूत्यै) ऐश्वर्य होने के अर्थ (जागरणम्) प्रबोध को और (आर्त्यै) पीड़ा की निवृत्ति के लिए (जनवादिनम्) मनुष्यों को प्रशंसा के योग्य वाद-विवाद करने वाले उत्तम मनुष्य को उत्पन्न वा प्रकट कीजिए॥१७॥
Essence
जो मनुष्य नीचों का संग छोड़ के उत्तम पुरुषों की सङ्गति करते हैं, वे सब व्यवहारों की सिद्धि से ऐश्वर्य वाले हाते हैं। जो अनालसी होके सिद्धि के लिए यत्न करते, वे सुखी और जो आलसी होते वे दरिद्रता को प्राप्त होते हैं॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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