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Yajurveda Adhyay 20 / Mantra 1

90 Mantra
20/1
Devata- सभोशो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- द्विपदा विराड गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क्ष॒त्रस्य॒ योनि॑रसि क्ष॒त्रस्य॒ नाभि॑रसि। मा त्वा॑ हिꣳसी॒न्मा मा॑ हिꣳसीः॥१॥

क्ष॒त्रस्य॑। योनिः॑। अ॒सि॒। क्ष॒त्रस्य॑। नाभिः॑। अ॒सि॒। मा। त्वा॒। हि॒ꣳसी॒त्। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒ ॥१ ॥

Mantra without Swara
क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसि । मा त्वा हिँसीन्मा मा हिँसीः ॥

क्षत्रस्य। योनिः। असि। क्षत्रस्य। नाभिः। असि। मा। त्वा। हिꣳसीत्। मा। मा। हिꣳसीः॥१॥

Meaning
हे सभापते! जिससे तू (क्षत्रस्य) राज्य का (योनिः) निमित्त (असि) है, (क्षत्रस्य) राजकुल का (नाभिः) नाभि के समान जीवन हेतु (असि) है, इससे (त्वा) तुझको कोई भी (मा, हिंसीत्) मत मारे, तू (मा) मुझे (मा, हिंसीः) मत मारे॥१॥
Essence
स्वामी और भृत्यजन परस्पर ऐसी प्रतिज्ञा करें कि राजपुरुष प्रजापुरुषों और प्रजापुरुष राजपुरुषों की निरन्तर रक्षा करें, जिससे सबके सुख की उन्नति होवे॥१॥
Subject
अब बीसवें अध्याय का आरम्भ है, इसके आदि से राजधर्म विषय का वर्णन करते हैं॥

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