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Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 37

95 Mantra
19/37
Devata- सरस्वती देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पु॒नन्तु॑ मा पि॒तरः॑ सो॒म्यासः॑ पु॒नन्तु॑ मा पिताम॒हाः पु॒नन्तु॒ प्रपि॑तामहाः। प॒वित्रे॑ण श॒तायु॑षा। पु॒नन्तु॑ मा पिताम॒हाः पु॒नन्तु॒ प्रपि॑तामहाः। प॒वित्रे॑ण श॒तायु॑षा विश्व॒मायु॒र्व्यश्नवै॥३७॥

पु॒नन्तु॑। मा॒। पि॒तरः॑। सो॒म्यासः॑। पु॒नन्तु॑। मा॒। पि॒ता॒म॒हाः। पु॒नन्तु॑। प्रपि॑तामहा॒ इति॒ प्रऽपि॑तामहाः। प॒वित्रे॑ण। श॒तायु॒षेति॑ श॒तऽआ॑युषा। पु॒नन्तु॑। मा॒। पि॒ता॒म॒हाः। पु॒नन्तु॑। प्रपि॑तामहा॒ इति॒ प्रऽपि॑तामहाः। प॒वित्रे॑ण। श॒तायु॒षेति॑ श॒तऽआ॑युषा। विश्व॑म्। आयुः॑। वि। अ॒श्न॒वै॒ ॥३७ ॥

Mantra without Swara
पुनन्तु मा पितरः सोम्यासः पुनन्तु मा पितामहाः । पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा । पुनन्तु मा पितामहाः सोम्यासः पुनन्तु प्रपितामहाः । पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्नवै ॥

पुनन्तु। मा। पितरः। सोम्यासः। पुनन्तु। मा। पितामहाः। पुनन्तु। प्रपितामहा इति प्रऽपितामहाः। पवित्रेण। शतायुषेति शतऽआयुषा। पुनन्तु। मा। पितामहाः। पुनन्तु। प्रपितामहा इति प्रऽपितामहाः। पवित्रेण। शतायुषेति शतऽआयुषा। विश्वम्। आयुः। वि। अश्नवै॥३७॥

Meaning
(सोम्यासः) ऐश्वर्य से युक्त वा चन्द्रमा के तुल्य शान्त (पितरः) ज्ञान देने से पालक पितर लोग (पवित्रेण) शुद्ध (शतायुषा) सौ वर्ष की आयु से (मा) मुझ को (पुनन्तु) पवित्र करें, अति बुद्धिमान् चन्द्रमा के तुल्य आनन्दकर्त्ता (पितामहाः) पिताओं के पिता उस अतिशुद्ध सौ वर्षयुक्त आयु से (मा) मुझ को (पुनन्तु) पवित्र करें। ऐश्वर्यदाता चन्द्रमा के तुल्य शीतल स्वभाव वाले (प्रपितामहाः) पितामहों के पिता लोग शुद्ध सौ वर्ष पर्य्यन्त जीवन से (मा) मुझ को (पुनन्तु) पवित्र करें। विद्यादि ऐश्वर्ययुक्त वा शान्तस्वभाव (पितामहाः) पिताओं के पिता (पवित्रेण) अतीव शुद्धानन्दयुक्त (शतायुषा) शत वर्ष पर्य्यन्त आयु से मुझ को (पुनन्तु) पवित्राचरणयुक्त करें। सुन्दर ऐश्वर्य के दाता वा शन्तियुक्त (प्रपितामहाः) पितामहों के पिता पवित्र धर्माचरणयुक्त सौ वर्ष पर्यन्त आयु से मुझ को (पुनन्तु) पवित्र करें, जिससे मैं (विश्वम्) सम्पूर्ण (आयुः) जीवन को (व्यश्नवै) प्राप्त होऊं॥३७॥
Essence
पिता, पितामह और प्रपितामहों को योग्य है कि अपने कन्या और पुत्रों को ब्रह्मचर्य, अच्छी शिक्षा और धर्मोपदेश से संयुक्त करके विद्या और उत्तम शील से युक्त करें। सन्तानों को योग्य है कि पितादि की सेवा और अनुकूल आचरण से पिता आदि सभों की नित्य सेवा करें, ऐसे परस्पर उपकार से गृहाश्रम में आनन्द के साथ वर्त्तना चाहिये॥३७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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