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Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 71

117 Mantra
12/71
Devata- कृषीवला देवताः Rishi- कुमारहारित ऋषिः Chhand- विराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
लाङ्ग॑लं॒ पवी॑रवत् सु॒शेव॑ꣳ सोम॒पित्स॑रु। तदुद्व॑पति॒ गामविं॑ प्रफ॒र्व्यं च॒ पीव॑रीं प्र॒स्थाव॑द् रथ॒वाह॑णम्॥७१॥

लाङ्ग॑लम्। पवी॑रवत्। सु॒शेव॒मिति॑ऽसु॒ऽशेव॑म्। सो॒म॒पित्स॒र्विति॑ सोम॒पिऽत्स॑रु। तत्। उत्। व॒प॒ति॒। गाम्। अवि॑म्। प्र॒फ॒र्व्य᳖मिति॑ प्रऽफ॒र्व्य᳖म्। च॒। पीव॑रीम्। प्र॒स्थाव॒दिति॑ प्र॒स्थाऽव॑त्। र॒थ॒वाह॑नम्। र॒थ॒वाह॑न॒मिति॑ रथ॒ऽवाह॑नम् ॥७१ ॥

Mantra without Swara
लाङ्गलम्पवीरवत्सुशेवँ सोमपित्सरु । तदुद्वपति गामविम्प्रपर्व्यञ्च पीवरीम्प्रस्थावद्रथवाहणम् ॥

लाङ्गलम्। पवीरवत्। सुशेवमितिऽसुऽशेवम्। सोमपित्सर्विति सोमपिऽत्सरु। तत्। उत्। वपति। गाम्। अविम्। प्रफर्व्यमिति प्रऽफर्व्यम्। च। पीवरीम्। प्रस्थावदिति प्रस्थाऽवत्। रथवाहनम्। रथवाहनमिति रथऽवाहनम्॥७१॥

Meaning
हे किसानो! तुम लोग जो (सोमपित्सरु) जौ आदि ओषधियों के रक्षकों को टेढ़ा चलावे (पवीरवत्) प्रशंसित फाल से युक्त (सुशेवम्) सुन्दर सुखदायक (लाङ्गलम्) फाले के पीछे जो दृढ़ता के लिये काष्ठ लगाया जाता है, वह (च) और (प्रफर्व्यम्) चलाने योग्य (प्रस्थावत्) प्रशंसित प्रस्थान वाला (रथवाहनम्) रथ के चलने का साधन है, जिससे (अविम्) रक्षा आदि के हेतु (पीवरीम्) सब पदार्थों को भुगाने का हेतु स्थूल (गाम्) पृथिवी को (उद्वपति) उखाड़ते हैं (तत्) उसको तुम भी सिद्ध करो॥७१॥
Essence
किसान लोगों को उचित है कि मोटी मट्टी अन्न आदि की उत्पत्ति से रक्षा करने हारी पृथिवी की अच्छे प्रकार परीक्षा करके हल आदि साधनों से जोत, एकसार कर, सुन्दर संस्कार किये बीज [बो] के उत्तम धान्य उत्पन्न करके भोगें॥७१॥
Subject
फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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