2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 9 / Shloka 46 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 9
Shloka 46

Ayodhyakand

119 Sarga
66 Shloka
2/9/46
2-Ayodhyakand / Sarga 9 Shloka 46
Shloka
हृदये ते निविष्टास् ता भूयश् चान्याः सहस्रशः।
तदेव स्थगु(=पृष्ठ-वक्रभागः) यद् दीर्घं रथ-घोणम् इवायतम्॥ ४६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘असुरराज शम्बरको जिन सहस्रों मायाओंका ज्ञान है, वे सब तेरे हृदयमें स्थित हैं; इनके अलावे भी तू हजारों प्रकारकी मायाएँ जानती है। इन मायाओंका समुदाय ही तेरा यह बड़ा-सा कुब्बड़ है, जो रथके नकुए (अग्रभाग) के समान बड़ा है। इसीमें तेरी मति, स्मृति और बुद्धि, क्षत्रविद्या (राजनीति) तथा नाना प्रकारकी मायाएँ निवास करती हैं॥ ४५-४६॥