2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 9 / Shloka 37 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 9
Shloka 37

Ayodhyakand

119 Sarga
66 Shloka
2/9/37
2-Ayodhyakand / Sarga 9 Shloka 37
Shloka
हृष्टा प्रतीता कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्।
सा हि वाक्येन कुब्जायाः किशोरीवोत्पथं गता॥ ३७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

ऐसी बातें कहकर मन्थराने कैकेयीकी बुद्धिमें अनर्थको ही अर्थरूपमें जँचा दिया। कैकेयीको उसकी बातपर विश्वास हो गया और वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि वह बहुत समझदार थी, तो भी कुबरीके कहनेसे नादान बालिकाकी तरह कुमार्गपर चली गयी—अनुचित काम करनेको तैयार हो गयी। उसे मन्थराकी बुद्धिपर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उससे इस प्रकार बोली—॥ ३६-३७॥