2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 7 / Shloka 36 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 7
Shloka 36

Ayodhyakand

119 Sarga
36 Shloka
2/7/36
2-Ayodhyakand / Sarga 7 Shloka 36
Shloka
न मे परं किंचिदितो वरं पुनः
प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोऽमृतम्।
तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरं
वरं परं ते प्रददामि तं वृणु॥ ३६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘मन्थरे! तू मुझसे प्रिय वस्तु पानेके योग्य है। मेरे लिये श्रीरामके अभिषेकसम्बन्धी इस समाचारसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय एवं अमृतके समान मधुर वचन नहीं कहा जा सकता। ऐसी परम प्रिय बात तुमने कही है; अत: अब यह प्रिय संवाद सुनानेके बाद तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले, मैं उसे अवश्य दूँगी’॥ ३६॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥