2-Ayodhyakand / Sarga 66
Shloka 5
Shloka
भर्तारम् तम् परित्यज्य का स्त्री दैवतम् आत्मनः ।इच्चेज् जीवितुम् अन्यत्र कैकेय्याः त्यक्त धर्मणः ॥२-६६-५॥
