2-Ayodhyakand / Sarga 65
Shloka 28
Shloka
सर्वतः तुमुल आक्रन्दम् परिताप आर्त बान्धवम् ।सद्यो निपतित आनन्दम् दीन विक्लव दर्शनम् ॥२-६५-२८॥
बभूव नर देवस्य सद्म दिष्ट अन्तम् ईयुषः ।
