2-Ayodhyakand / Sarga 65
Shloka 24
Shloka
न बभ्राज रजो ध्वस्ता तारा इव गगन च्युता ।नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्याम् पतिताम् भुवि ॥२-६५-२४॥
Sarga 65 / Shloka 24 Ayodhyakand