2-Ayodhyakand / Sarga 62
Shloka 9
Shloka
सा त्वम् धर्म परा नित्यम् दृष्ट लोक पर अवर ।न अर्हसे विप्रियम् वक्तुम् दुह्खिता अपि सुदुह्खितम् ॥२-६२-९॥
