2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 6 / Shloka 28 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 6
Shloka 28

Ayodhyakand

119 Sarga
28 Shloka
2/6/28
2-Ayodhyakand / Sarga 6 Shloka 28
Shloka
ततस्तदिन्द्रक्षयसंनिभं पुरं
दिदृक्षुभिर्जानपदैरुपाहितैः।
समन्ततः सस्वनमाकुलं बभौ
समुद्रयादोभिरिवार्णवोदकम्॥ २८॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उस समय श्रीरामके अभिषेकका उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए जनपदवासी मनुष्योंद्वारा सब ओरसे भरा हुआ वह इन्द्रपुरीके समान नगर अत्यन्त कोलाहलपूर्ण होनेके कारण मकर, नक्र, तिमिङ्गल आदि विशाल जल-जन्तुओंसे परिपूर्ण महासागरके समान प्रतीत होता था॥ २८॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥