2-Ayodhyakand / Sarga 58
Shloka 34
Shloka
जानकी तु महा राज निःश्वसन्ती तपस्विनी ।भूत उपहत चित्ता इव विष्ठिता वृष्मृता स्थिता ॥२-५८-३४॥
Sarga 58 / Shloka 34 Ayodhyakand