2-Ayodhyakand / Sarga 54
Shloka 38
Shloka
रात्र्याम् तु तस्याम् व्युष्टायाम् भरद्वाजो अब्रवीद् इदम् ।मधु मूल फल उपेतम् चित्र कूटम् व्रज इति ह ॥२-५४-३८॥
