2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 52 / Shloka 99 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 52
Shloka 99

Ayodhyakand

119 Sarga
101 Shloka
2/52/99
2-Ayodhyakand / Sarga 52 Shloka 99
Shloka
गतम् तु गन्गा पर पारम् आशु ।
रामम् सुमन्त्रः प्रततम् निरीक्ष्य ।
अध्व प्रकर्षात् विनिवृत्त दृष्टिर् ।
र्मुमोच बाष्पम् व्यथितः तपस्वी ॥२-५२-१००॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजीके उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे। जब वनके मार्गमें बहुत दूर निकल जानेके कारण वे दृष्टिसे ओझल हो गये , तब तपस्वी सुमन्त्रके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ १००॥