2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 52 / Shloka 93 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 52
Shloka 93

Ayodhyakand

119 Sarga
101 Shloka
2/52/93
2-Ayodhyakand / Sarga 52 Shloka 93
Shloka
अथ अब्रवीन् महा बाहुः सुमित्र आनन्द वर्धनम् ।
भव सम्रक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा ॥२-५२-९४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे बोले—‘सुमित्राकुमार! अब तुम सजन या निर्जन वनमें सीताकी रक्षाके लिये सावधान हो जाओ। हम-जैसे लोगोंको निर्जन वनमें नारीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये। अत: तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा। पुरुषप्रवर! हमलोगोंको एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये॥ ९४—९६॥