2-Ayodhyakand / Sarga 52
Shloka 41
Shloka
दैन्यम् हि नगरी गच्चेद् दृष्ट्वा शून्यम् इमम् रथम् ।सूत अवशेषम् स्वम् सैन्यम् हत वीरम् इव आहवे ॥२-५२-४१॥
