2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 52 / Shloka 39 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 52
Shloka 39

Ayodhyakand

119 Sarga
101 Shloka
2/52/39
2-Ayodhyakand / Sarga 52 Shloka 39
Shloka
कथम् हि त्वद् विहीनो अहम् प्रतियास्यामि ताम् पुरीम् ।
तव तात वियोगेन पुत्र शोक आकुलाम् इव ॥२-५२-३९॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘तात! सेवकका स्वामीके प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुखसे स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा। जो आपके वियोगसे पुत्रशोकसे आतुर हुई माताकी भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरीमें मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा? ॥ ३८-३९॥