2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 51 / Shloka 9 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 51
Shloka 9

Ayodhyakand

119 Sarga
27 Shloka
2/51/9
2-Ayodhyakand / Sarga 51 Shloka 9
Shloka
कथम् दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया ।
शक्या निद्रा मया लब्धुम् जीवितम् वा सुखानि वा ॥२-५१-९॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

यह सुनकर लक्ष्मणने कहा—‘निष्पाप निषादराज! तुम धर्मपर ही दृष्टि रखते हुए हमारी रक्षा करते हो, इसलिये इस स्थानपर हम सब लोगोंके लिये कोई भय नहीं है। फिर भी जब महाराज दशरथके ज्येष्ठ पुत्र सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन-धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ८-९॥