2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 51 / Shloka 23 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 51
Shloka 23

Ayodhyakand

119 Sarga
27 Shloka
2/51/23
2-Ayodhyakand / Sarga 51 Shloka 23
Shloka
आराम उद्यान सम्पन्नाम् समाज उत्सव शालिनीम् ।
सुखिता विचरिष्यन्ति राज धानीम् पितुर् मम ॥२-५१-२३॥

Bhashya Content For This Shloka

1 Bhashyas
Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे विभूषित तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥ २१—२३॥