2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 51 / Shloka 22 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 51
Shloka 22

Ayodhyakand

119 Sarga
27 Shloka
2/51/22
2-Ayodhyakand / Sarga 51 Shloka 22
Shloka
रथ अश्व गज सम्बाधाम् तूर्य नाद विनादिताम् ।
सर्व कल्याण सम्पूर्णाम् हृष्ट पुष्ट जन आकुलाम् ॥२-५१-२२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे विभूषित तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥ २१—२३॥