2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 51 / Shloka 21 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 51
Shloka 21

Ayodhyakand

119 Sarga
27 Shloka
2/51/21
2-Ayodhyakand / Sarga 51 Shloka 21
Shloka
रम्य चत्वर सम्स्थानाम् सुविभक्त महा पथाम् ।
हर्म्य प्रसाद सम्पन्नाम् गणिका वर शोभिताम् ॥२-५१-२१॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘(यदि पिताजी जीवित रहे तो) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ वाराङ्गनाओंसे सुशोभित, रथों, घोड़ों और हाथियोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे सेवित, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे विभूषित तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं॥ २१—२३॥