2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 50 / Shloka 51 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 50
Shloka 51

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/50/51
2-Ayodhyakand / Sarga 50 Shloka 51
Shloka
तथा शयानस्य ततः अस्य धीमतः ।
यशस्विनो दाशरथेर् महात्मनः ।
अदृष्ट दुह्खस्य सुख उचितस्य सा ।
तदा व्यतीयाय चिरेण शर्वरी ॥२-५०-५१॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इस प्रकार सोये हुए यशस्वी मनस्वी दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामकी, जिन्होंने कभी दु:ख नहीं देखा था तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य थे, वह रात उस समय (नींद न आनेके कारण) बहुत देरके बाद व्यतीत हुई॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५०॥