2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 50 / Shloka 37 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 50
Shloka 37

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/50/37
2-Ayodhyakand / Sarga 50 Shloka 37
Shloka
ततः गुणवद् अन्न अद्यम् उपादाय पृथग् विधम् ।
अर्घ्यम् च उपानयत् क्षिप्रम् वाक्यम् च इदम् उवाच ह ॥२-५०-३७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

फिर भाँति-भाँतिका उत्तम अन्न लेकर वह सेवामें उपस्थित हुआ। उसने शीघ्र ही अर्घ्य निवेदन किया और इस प्रकार कहा—‘महाबाहो! आपका स्वागत है। यह सारी भूमि, जो मेरे अधिकारमें है, आपकी ही है। हम आपके सेवक हैं और आप हमारे स्वामी, आजसे आप ही हमारे इस राज्यका भलीभाँति शासन करें। यह भक्ष्य (अन्न आदि), भोज्य (खीर आदि), पेय (पानकरस आदि) तथा लेह्य (चटनी आदि) आपकी सेवामें उपस्थित है, इसे स्वीकार करें। ये उत्तमोत्तम शय्याएँ हैं तथा आपके घोड़ोंके खानेके लिये चने और घास आदि भी प्रस्तुत हैं—ये सब सामग्री ग्रहण करें’॥ ३७—३९॥