2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 50 / Shloka 36 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 50
Shloka 36

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/50/36
2-Ayodhyakand / Sarga 50 Shloka 36
Shloka
तम् आर्तः सम्परिष्वज्य गुहो राघवम् अब्रवीत् ।
यथा अयोध्या तथा इदम् ते राम किम् करवाणि ते ॥२-५०-३६॥
ईदृशम् हि महाबाहो कः प्रप्स्यत्यतिथिम् प्रियम् ।

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

श्रीरामचन्द्रजीको वल्कल आदि धारण किये देख गुहको बड़ा दु:ख हुआ। उसने श्रीरघुनाथजीको हृदयसे लगाकर कहा—‘श्रीराम! आपके लिये जैसे अयोध्याका राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? महाबाहो! आप-जैसा प्रिय अतिथि किसको सुलभ होगा?’॥ ३६॥