2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 50 / Shloka 10 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 50
Shloka 10

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/50/10
2-Ayodhyakand / Sarga 50 Shloka 10
Shloka
लक्षणीयान्न रेम्द्राणाम् ब्रह्मघोषाभिनादितान् ।
रथेन पुरुषव्याघ्रः कोसलानत्यवर्तत ॥२-५०-१०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इसके बाद पुरुषसिंह श्रीराम रथके द्वारा ही उस कोसल जनपदको लाँघ गये, जो धन-धान्यसे सम्पन्न और सुखदायक था। वहाँके सब लोग दानशील थे। उस जनपदमें कहींसे कोई भय नहीं था। वहाँके भूभाग रमणीय एवं चैत्य-वृक्षों तथा यज्ञ-सम्बन्धी यूपोंसे व्याप्त थे। बहुत-से उद्यान और आमोंके वन उस जनपदकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ जलसे भरे हुए बहुत-से जलाशय सुशोभित थे। सारा जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा था; गौओंके समूहोंसे व्याप्त और सेवित था। वहाँके ग्रामोंकी बहुत-से नरेश रक्षा करते थे तथा वहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँजती रहती थी॥ ८—१०॥