2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 48 / Shloka 30 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 48
Shloka 30

Ayodhyakand

119 Sarga
37 Shloka
2/48/30
2-Ayodhyakand / Sarga 48 Shloka 30
Shloka
पूर्वाभिभाषी मधुरः सत्यवादी महाबलः ।
सौम्यः सर्वस्य लोकस्य चन्द्रवत्प्रियदर्शनः ॥२-४८-३०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर है। उनके शरीरकी कान्ति श्याम, गलेकी हँसली मांससे ढकी हुई, भुजाएँ घुटनोंतक लंबी और नेत्र कमलके समान सुन्दर हैं। वे सामने आनेपर पहले ही बातचीत छेड़ते हैं तथा मीठे और सत्य वचन बोलते हैं। श्रीराम शत्रुओंका दमन करनेवाले और महान् बलवान् हैं। समस्त जगत्के लिये सौम्य (कोमल स्वभाववाले) हैं। उनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्यारा है॥ २९-३०॥