2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 46 / Shloka 30 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 46
Shloka 30

Ayodhyakand

119 Sarga
34 Shloka
2/46/30
2-Ayodhyakand / Sarga 46 Shloka 30
Shloka
मोहनार्थं तु पौराणां सूतं रामोऽब्रवीद् वचः।
उदङ्मुखः प्रयाहि त्वं रथमारुह्य सारथे॥ ३०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उस समय श्रीरामने पुरवासियोंको भुलावा देनेके लिये सुमन्त्रसे यह बात कही—‘सारथे! (हमलोग तो यहीं उतर जाते हैं;) परंतु आप रथपर आरूढ़ होकर पहले उत्तर दिशाकी ओर जाइये। दो घड़ीतक तीव्र गतिसे उत्तर जाकर फिर दूसरे मार्गसे रथको यहीं लौटा लाइये। जिस तरह भी पुरवासियोंको मेरा पता न चले, वैसा एकाग्रतापूर्वक प्रयत्न कीजिये’॥ ३०-३१॥