2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 42 / Shloka 24 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 42
Shloka 24

Ayodhyakand

119 Sarga
35 Shloka
2/42/24
2-Ayodhyakand / Sarga 42 Shloka 24
Shloka
तामवेक्ष्य पुरीं सर्वां राममेवानुचिन्तयन्।
विलपन् प्राविशद् राजा गृहं सूर्य इवाम्बुदम्॥ २४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

उन्होंने देखा, अयोध्यापुरीके प्रत्येक घरका बाहरी चबूतरा और भीतरी भाग भी सूना हो रहा है। (क्योंकि उन घरोंके सब लोग श्रीरामके पीछे चले गये थे।) बाजार-हाट बंद है। जो लोग नगरमें हैं, वे भी अत्यन्त क्लान्त, दुर्बल और दु:खसे आतुर हो रहे हैं तथा बड़ी-बड़ी सड़कोंपर भी अधिक आदमी जाते-आते नहीं दिखायी देते हैं। सारे नगरकी यह अवस्था देखकर श्रीरामके लिये ही चिन्ता और विलाप करते हुए राजा उसी तरह महलके भीतर गये, जैसे सूर्य मेघोंकी घटामें छिप जाते हैं॥ २३-२४॥