2-Ayodhyakand / Sarga 40
Shloka 45
Shloka
रामलक्ष्मणसीतार्थं स्रवन्तीं वारि नेत्रजम्।असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम्॥ ४५॥
Sarga 40 / Shloka 45 Ayodhyakand