2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 40 / Shloka 45 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 40
Shloka 45

Ayodhyakand

119 Sarga
51 Shloka
2/40/45
2-Ayodhyakand / Sarga 40 Shloka 45
Shloka
रामलक्ष्मणसीतार्थं स्रवन्तीं वारि नेत्रजम्।
असकृत् प्रैक्षत स तां नृत्यन्तीमिव मातरम्॥ ४५॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की रट लगाती और रोती हुई कौसल्या उस रथके पीछे दौड़ रही थीं। वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताके लिये नेत्रोंसे आँसू बहा रही थीं एवं इधर-उधर नाचती—चक्कर लगाती-सी डोल रही थीं। इस अवस्थामें माता कौसल्याको श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार देखा॥ ४४-४५॥