2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 38 / Shloka 14 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 38
Shloka 14

Ayodhyakand

119 Sarga
16 Shloka
2/38/14
2-Ayodhyakand / Sarga 38 Shloka 14
Shloka
इयं धार्मिक कौसल्या मम माता यशस्विनी।
वृद्धा चाक्षुद्रशीला च न च त्वां देव गर्हते॥ १४॥
मया विहीनां वरद प्रपन्नां शोकसागरम्।
अदृष्टपूर्वव्यसनां भूयः सम्मन्तुमर्हसि॥ १५॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘धर्मात्मन्! ये मेरी यशस्विनी माता कौसल्या अब वृद्ध हो चली हैं। इनका स्वभाव बहुत ही उच्च और उदार है। देव! यह कभी आपकी निन्दा नहीं करती हैं। इन्होंने पहले कभी ऐसा भारी संकट नहीं देखा होगा। वरदायक नरेश! ये मेरे न रहनेसे शोकके समुद्रमें डूब जायँगी। अत: आप सदा इनका अधिक सम्मान करते रहें॥ १४-१५॥