2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 37 / Shloka 34 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 37
Shloka 34

Ayodhyakand

119 Sarga
37 Shloka
2/37/34
2-Ayodhyakand / Sarga 37 Shloka 34
Shloka
अथोत्तमान्याभरणानि देवि
देहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम्।
न चीरमस्याः प्रविधीयतेति
न्यवारयत् तद् वसनं वसिष्ठः॥ ३४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘देवि! सीता तेरी पुत्रवधू हैं। इनके शरीरसे वल्कल-वस्त्र हटाकर तू इन्हें पहननेके लिये उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण दे। इनके लिये वल्कल-वस्त्र देना कदापि उचित नहीं है।’ ऐसा कहकर वसिष्ठने उसे जानकीको वल्कल-वस्त्र पहनानेसे मना किया॥ ३४॥