2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 37 / Shloka 10 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 37
Shloka 10

Ayodhyakand

119 Sarga
37 Shloka
2/37/10
2-Ayodhyakand / Sarga 37 Shloka 10
Shloka
सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः।
कैकेय्याः कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा॥ १०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तदनन्तर रेशमी-वस्त्र पहनने और धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाली धर्मज्ञा शुभलक्षणा जनकनन्दिनी सीता अपने पहननेके लिये भी चीरवस्त्रको प्रस्तुत देख उसी प्रकार डर गयीं, जैसे मृगी बिछे हुए जालको देखकर भयभीत हो जाती है। वे कैकेयीके हाथसे दो वल्कल-वस्त्र लेकर लज्जित-सी हो गयीं। उनके मनमें बड़ा दु:ख हुआ और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उस समय उन्होंने गन्धर्वराजके समान तेजस्वी पतिसे इस प्रकार पूछा—‘नाथ! वनवासी मुनिलोग चीर कैसे बाँधते हैं?’ यह कहकर उसे धारण करनेमें कुशल न होनेके कारण सीता बारम्बार मोहमें पड़ जाती थीं—भूल कर बैठती थीं॥