2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 36 / Shloka 25 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 36
Shloka 25

Ayodhyakand

119 Sarga
32 Shloka
2/36/25
2-Ayodhyakand / Sarga 36 Shloka 25
Shloka
स फालपिटकं गृह्य गिरिदुर्गाण्यलोकयत्।
दिशः सर्वास्त्वनुचरन् स यथा पापकर्मकृत्॥ २५॥
इत्येनमत्यजद् राजा सगरो वै सुधार्मिकः।
रामः किमकरोत् पापं येनैवमुपरुध्यते॥ २६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘असमञ्जने फाल और पिटारी लेकर पर्वतोंकी दुर्गम गुफाओंको ही अपने निवासके योग्य देखा और कन्द आदिके लिये वह सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगा। वह जैसा कि बताया गया है, पापाचारी था, इसलिये परम धार्मिक राजा सगरने उसको त्याग दिया था। श्रीरामने ऐसा कौन-सा अपराध किया है, जिसके कारण इन्हें इस तरह राज्य पानेसे रोका जा रहा है?॥