2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 36 / Shloka 14 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 36
Shloka 14

Ayodhyakand

119 Sarga
32 Shloka
2/36/14
2-Ayodhyakand / Sarga 36 Shloka 14
Shloka
वहन्तं किं तुदसि मां नियुज्य धुरि माहिते।
अनार्ये कृत्यमारब्धं किं न पूर्वमुपारुधः॥ १४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘अनार्ये! अहितकारिणि! तू रामको वनवास देनेके दुर्वह भारमें लगाकर जब मैं उस भारको ढो रहा हूँ, उस अवस्थामें क्यों अपने वचनोंका चाबुक मारकर मुझे पीड़ा दे रही है? इस समय जो कार्य तूने आरम्भ किया है अर्थात् श्रीरामके साथ सेना और सामग्री भेजनेमें जो प्रतिबन्ध लगाया है, इसके लिये तूने पहले ही क्यों नहीं प्रार्थना की थी? (अर्थात् पहले ही यह क्यों नहीं कह दिया था कि श्रीरामको अकेले वनमें जाना पड़ेगा, उनके साथ सेना आदि सामग्री नहीं जा सकती)’॥ १४॥