2-Ayodhyakand / Sarga 35
Shloka 4
Shloka
वाक्यवज्रैरनुपमैर्निर्भिन्दन्निव चाशुभैः।कैकेय्याः सर्वमर्माणि सुमन्त्रः प्रत्यभाषत॥ ४॥
Sarga 35 / Shloka 4 Ayodhyakand