2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 34 / Shloka 37 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 34
Shloka 37

Ayodhyakand

119 Sarga
61 Shloka
2/34/37
2-Ayodhyakand / Sarga 34 Shloka 37
Shloka
वञ्चना या तु लब्धा मे तां त्वं निस्तर्तुमिच्छसि।
अनया वृत्तसादिन्या कैकेय्याभिप्रचोदितः॥ ३७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है। मुझे तुम्हारा वनमें जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राखमें छिपी हुई आगके समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्रायको छिपा रखा था। इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्पसे विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचारका विनाश करनेवाली इस कैकेयीने मुझे वरदानके लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो॥ ३६-३७॥