2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 34 / Shloka 36 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 34
Shloka 36

Ayodhyakand

119 Sarga
61 Shloka
2/34/36
2-Ayodhyakand / Sarga 34 Shloka 36
Shloka
न चैतन्मे प्रियं पुत्र शपे सत्येन राघव।
छन्नया चलितस्त्वस्मि स्त्रिया भस्माग्निकल्पया॥ ३६॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘परंतु बेटा रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुझे प्रिय नहीं है। मुझे तुम्हारा वनमें जाना अच्छा नहीं लगता। यह मेरी स्त्री कैकेयी राखमें छिपी हुई आगके समान भयंकर है। इसने अपने क्रूर अभिप्रायको छिपा रखा था। इसीने आज मुझे मेरे अभीष्ट संकल्पसे विचलित कर दिया है। कुलोचित सदाचारका विनाश करनेवाली इस कैकेयीने मुझे वरदानके लिये प्रेरित करके मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। इसके द्वारा जो वञ्चना मुझे प्राप्त हुई है, उसीको तुम पार करना चाहते हो॥ ३६-३७॥