2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 33 / Shloka 21 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 33
Shloka 21

Ayodhyakand

119 Sarga
31 Shloka
2/33/21
2-Ayodhyakand / Sarga 33 Shloka 21
Shloka
दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च।
अस्मत्त्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम्॥ २१॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकालें। आँगनकी फर्श खोद डालें। सारा धन-धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जायँ। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें—ऐसी दशामें इन घरोंपर कैकेयी आकर अधिकार कर ले॥ १८—२१॥