2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 31 / Shloka 30 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 31
Shloka 30

Ayodhyakand

119 Sarga
37 Shloka
2/31/30
2-Ayodhyakand / Sarga 31 Shloka 30
Shloka
अभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाक्षय्यसायकौ।
आदित्यविमलाभौ द्वौ खड्गौ हेमपरिष्कृतौ॥ ३०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘लक्ष्मण! राजा जनकके महान् यज्ञमें स्वयं महात्मा वरुणने उन्हें जो देखनेमें भयंकर दो दिव्य धनुष दिये थे, साथ ही, जो दो दिव्य अभेद्य कवच, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरकस तथा सूर्यकी भाँति निर्मल दीप्तिसे दमकते हुए जो दो सुवर्णभूषित खड्ग प्रदान किये थे (वे सभी दिव्यास्त्र मिथिलानरेशने मुझे दहेजमें दे दिये थे), उन सबको आचार्यदेवके घरमें सत्कारपूर्वक रखा गया है। तुम उन सारे आयुधोंको लेकर शीघ्र लौट आओ’॥ २९—३१॥