2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 30 / Shloka 47 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 30
Shloka 47

Ayodhyakand

119 Sarga
47 Shloka
2/30/47
2-Ayodhyakand / Sarga 30 Shloka 47
Shloka
ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा
यशस्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।
धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना
प्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्विनी॥ ४७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

तदनन्तर अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे अत्यन्त हर्षमें भरी हुई यशस्विनी एवं मनस्विनी सीता देवी स्वामीके आदेशपर विचार करके धर्मात्मा ब्राह्मणोंको धन और रत्नोंका दान करनेके लिये उद्यत हो गयीं॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३०॥