2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 3 / Shloka 45 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 3
Shloka 45

Ayodhyakand

119 Sarga
49 Shloka
2/3/45
2-Ayodhyakand / Sarga 3 Shloka 45
Shloka
इष्टानुरक्तप्रकृतिर्यः पालयति मेदिनीम्।
तस्य नन्दन्ति मित्राणि लब्ध्वामृतमिवामराः॥ ४५॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘मन्त्री, सेनापति आदि समस्त अधिकारियों तथा प्रजाजनोंको सदा प्रसन्न रखना। जो राजा कोष्ठागार (भण्डारगृह) तथा शस्त्रागार आदिके द्वारा उपयोगी वस्तुओंका बहुत बड़ा संग्रह करके मन्त्री, सेनापति और प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंको प्रिय मानकर उन्हें अपने प्रति अनुरक्त एवं प्रसन्न रखते हुए पृथ्वीका पालन करता है, उसके मित्र उसी प्रकार आनन्दित होते हैं, जैसे अमृतको पाकर देवता प्रसन्न हुए थे॥ ४४-४५॥