2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 3 / Shloka 12 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 3
Shloka 12

Ayodhyakand

119 Sarga
49 Shloka
2/3/12
2-Ayodhyakand / Sarga 3 Shloka 12
Shloka
यच्चान्यत् किंचिदेष्टव्यं तत् सर्वमुपकल्प्यताम्।
उपस्थापयत प्रातरग्न्यगारे महीपतेः॥ १२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘तुमलोग सुवर्ण आदि रत्न, देवपूजनकी सामग्री, सब प्रकारकी ओषधियाँ, श्वेत पुष्पोंकी मालाएँ, खील, अलग-अलग पात्रोंमें शहद और घी, नये वस्त्र, रथ, सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, चतुरङ्गिणी सेना, उत्तम लक्षणोंसे युक्त हाथी, चमरी गायकी पूँछके बालोंसे बने हुए दो व्यजन, ध्वज, श्वेत छत्र, अग्निके समान देदीप्यमान सोनेके सौ कलश, सुवर्णसे मढ़े हुए सींगोंवाला एक साँड, समूचा व्याघ्रचर्म तथा और जो कुछ भी वांछनीय वस्तुएँ हैं, उन सबको एकत्र करो और प्रात:काल महाराजकी अग्निशालामें पहुँचा दो॥ ८—१२॥