2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 3 / Shloka 10 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 3
Shloka 10

Ayodhyakand

119 Sarga
49 Shloka
2/3/10
2-Ayodhyakand / Sarga 3 Shloka 10
Shloka
चतुरङ्गबलं चैव गजं च शुभलक्षणम्।
चामरव्यजने चोभे ध्वजं छत्रं च पाण्डुरम्॥ १०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘तुमलोग सुवर्ण आदि रत्न, देवपूजनकी सामग्री, सब प्रकारकी ओषधियाँ, श्वेत पुष्पोंकी मालाएँ, खील, अलग-अलग पात्रोंमें शहद और घी, नये वस्त्र, रथ, सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, चतुरङ्गिणी सेना, उत्तम लक्षणोंसे युक्त हाथी, चमरी गायकी पूँछके बालोंसे बने हुए दो व्यजन, ध्वज, श्वेत छत्र, अग्निके समान देदीप्यमान सोनेके सौ कलश, सुवर्णसे मढ़े हुए सींगोंवाला एक साँड, समूचा व्याघ्रचर्म तथा और जो कुछ भी वांछनीय वस्तुएँ हैं, उन सबको एकत्र करो और प्रात:काल महाराजकी अग्निशालामें पहुँचा दो॥ ८—१२॥