2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 25 / Shloka 37 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 25
Shloka 37

Ayodhyakand

119 Sarga
47 Shloka
2/25/37
2-Ayodhyakand / Sarga 25 Shloka 37
Shloka
इति पुत्रस्य शेषाश्च कृत्वा शिरसि भामिनी।
गन्धैश्चापि समालभ्य राममायतलोचना॥ ३७॥

Bhashya Content For This Shloka

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

इस प्रकार आशीर्वाद देकर विशाललोचना भामिनी कौसल्याने पुत्रके मस्तकपर अक्षत रखकर चन्दन और रोली लगायी तथा सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली विशल्यकरणी नामक शुभ ओषधि लेकर रक्षाके उद्देश्यसे मन्त्र पढ़ते हुए उसको श्रीरामके हाथमें बाँध दिया; फिर उसमें उत्कर्ष लानेके लिये मन्त्रका जप भी किया॥