2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 21 / Shloka 57 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 21
Shloka 57

Ayodhyakand

119 Sarga
64 Shloka
2/21/57
2-Ayodhyakand / Sarga 21 Shloka 57
Shloka
धर्मार्थकामाः खलु जीवलोके
समीक्षिता धर्मफलोदयेषु।
ये तत्र सर्वे स्युरसंशयं मे
भार्येव वश्याभिमता सपुत्रा॥ ५७॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘इस जीवजगत्में पूर्वकृत धर्मके फलकी प्राप्तिके अवसरोंपर जो धर्म, अर्थ और काम तीनों देखे गये हैं, वे सब-के-सब जहाँ धर्म है, वहाँ अवश्य प्राप्त होते हैं—इसमें संशय नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे भार्या धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधन होती है। वह पतिके वशीभूत या अनुकूल रहकर अतिथि-सत्कार आदि धर्मके पालनमें सहायक होती है। प्रेयसीरूपसे कामका साधन बनती है और पुत्रवती होकर उत्तम लोककी प्राप्तिरूप अर्थकी साधिका होती है॥ ५७॥