2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 21 / Shloka 3 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 21
Shloka 3

Ayodhyakand

119 Sarga
64 Shloka
2/21/3
2-Ayodhyakand / Sarga 21 Shloka 3
Shloka
विपरीतश्च वृद्धश्च विषयैश्च प्रधर्षितः।
नृपः किमिव न ब्रूयाच्चोद्यमानः समन्मथः॥ ३॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘बड़ी माँ! मुझे भी यह अच्छा नहीं लगता कि श्रीराम राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके वनमें जायँ। महाराज तो इस समय स्त्रीकी बातमें आ गये हैं, इसलिये उनकी प्रकृति विपरीत हो गयी है। एक तो वे बूढ़े हैं, दूसरे विषयोंने उन्हें वशमें कर लिया है; अत: कामदेवके वशीभूत हुए वे नरेश कैकेयी-जैसी स्त्रीकी प्रेरणासे क्या नहीं कह सकते हैं?॥ २-३॥