2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 19 / Shloka 35 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 19
Shloka 35

Ayodhyakand

119 Sarga
40 Shloka
2/19/35
2-Ayodhyakand / Sarga 19 Shloka 35
Shloka
धारयन् मनसा दुःखमिन्द्रियाणि निगृह्य च।
प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान्॥ ३५॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

श्रीरामने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगानेकी मनाही कर दी। डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये। वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्योंको भी बिदा करके (आत्मीय जनोंके दु:खसे होनेवाले) दु:खको मनमें ही दबाकर इन्द्रियोंको काबूमें करके यह अप्रिय समाचार सुनानेके लिये माता कौसल्याके महलमें गये। उस समय उन्होंने मनको पूर्णत: वशमें कर रखा था॥ ३४-३५॥