2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 19 / Shloka 34 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 19
Shloka 34

Ayodhyakand

119 Sarga
40 Shloka
2/19/34
2-Ayodhyakand / Sarga 19 Shloka 34
Shloka
प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते।
विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान्॥ ३४॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

श्रीरामने अपने ऊपर सुन्दर छत्र लगानेकी मनाही कर दी। डुलाये जानेवाले सुसज्जित चँवर भी रोक दिये। वे रथको लौटाकर स्वजनों तथा पुरवासी मनुष्योंको भी बिदा करके (आत्मीय जनोंके दु:खसे होनेवाले) दु:खको मनमें ही दबाकर इन्द्रियोंको काबूमें करके यह अप्रिय समाचार सुनानेके लिये माता कौसल्याके महलमें गये। उस समय उन्होंने मनको पूर्णत: वशमें कर रखा था॥ ३४-३५॥