2-Ayodhyakand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 18 / Shloka 30 Ayodhyakand

Kand 2-Ayodhyakand
Sarga 18
Shloka 30

Ayodhyakand

119 Sarga
41 Shloka
2/18/30
2-Ayodhyakand / Sarga 18 Shloka 30
Shloka
तद् ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकांक्षितम्।
करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते॥ ३०॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

‘अहो! धिक्कार है! देवि! तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मैं महाराजके कहनेसे आगमें भी कूद सकता हूँ, तीव्र विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी गिर सकता हूँ! महाराज मेरे गुरु, पिता और हितैषी हैं, मैं उनकी आज्ञा पाकर क्या नहीं कर सकता? इसलिये देवि! राजाको जो अभीष्ट है, वह बात मुझे बताओ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे पूर्ण करूँगा। राम दो तरहकी बात नहीं करता है’॥ २८—३०॥